Saturday, July 7, 2018

अगर नहीं पीते मलाई वाला दूध, तो आपको हो सकता है पार्किंसन रोग का खतरा


आज आपको बता रहे हैं किन वजहों से पार्किंसन रोग होने का खतरा बढ़ जाता है. दुनियाभर में तकरीबन एक करोड़ लोग इस लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं. पार्किंसन से संबंधित एक रिसर्च भी आई है जिसमें कहा गया है कि बिना मलाई वाला दूध पीने से पार्किंसन होने की आशंका 39 फीसदी तक बढ़ जाती है.


अगर नहीं पीते मलाई वाला दूध, तो आपको हो सकता है पार्किंसन रोग का  खतरा


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क्या कहती है रिसर्च

रिसर्च के मुताबिक, आजकल युवा वजन कम करने के चक्कर में बिना मलाई का दूध पीना पसंद करते हैं. ऐसे में रोजाना मलाई रहित दूध पीने से पार्किंसन बीमारी होने का जोखिम बढ़ सकता है. रिसर्च में ये भी पाया कि अगर आप रोजाना तीन बार मलाई रहित दूध ले रहे हैं तो भी पार्किंसन बीमारी का खतरा 34 फीसदी अधिक बना रहता है क्योंकि इससे भी शरीर को वसा की जरूरी मात्रा नहीं मिल पाती.


क्या होता है पार्किंसन रोग में

पार्किंसन बीमारी में दिमाग के उस हिस्से की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं जो गति को नियंत्रित करता है. कंपन, मांसपेशियों में सख्ती, तालेमल की कमी और गति में धीमापन इसके आम लक्षण हैं.


किसने करवाई रिसर्च

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा ये रिसर्च की गई जिसमें कहा गया कि कम वसा वाले डेयरी उत्पादों के नियमित सेवन और मस्तिष्क की सेहत या नर्व्स  संबंधी स्थिति के बीच एक अहम जुड़ाव है.


कैसे की गई रिसर्च
शोधकर्ताओं ने 1.30 लाख लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण करके यह नतीजा निकाला. ये आंकड़े इन लोगों की 25 साल तक निगरानी करके जुटाए गए. यह अध्ययन मेडिकल जर्नल ‘न्यूरोलॉजी’में प्रकाशित हुआ है.


रिसर्च के नतीजे
आंकड़ों ने दिखाया कि जो लोग नियमित रूप से दिन में एक बार मलाईरहित, उनमें पार्किंसन बीमारी होने की संभावना उन लोगों के मुकाबले 39 फीसदी अधिक थी, जो हफ्ते में एक बार से भी कम ऐसा दूध पीते थे. शोधकर्ताओं ने कहा, लेकिन जो लोग नियमित रूप से पूरी मलाईवाला दूध पीते थे उनमें यह जोखिम नजर नहीं आया. शोधकर्ताओं के मुताबिक पूर्ण मलाईदार डेयरी उत्पादों के सेवन से पार्किंसन बीमारी का खतरा कम किया जा सकता है.


क्या कहते हैं एक्सपर्ट
राजधानी दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग में वरिष्ठ कंसलटेंट डॉ. माधुरी बिहारी का कहना है कि शरीर की गति को नियंत्रित करने वाले हिस्से के क्षतिग्रस्त होने से यह लाइलाज बीमारी इंसान को एकदम बेबस बना देती है. ऐसे में परिवार के सदस्यों का सहयोग, सामान्य स्वास्थ्य देखभाल, व्यायाम और उचित भोजन से मरीज की परेशानियों को कुछ कम जरूर किया जा सकता है.
डॉ. माधुरी के अनुसार पिछले 40 वर्ष में उन्होंने ऐसे बहुत से मरीज देखे हैं जो परिवार का उचित सहयोग मिलने पर अपनी इस बेदर्द बीमारी के साथ जीना सीख लेते हैं.




पार्किंसन बीमारी के आम लक्षण
शरीर के अंगों और चेहरे का लगातार हिलते रहना, चलने और बोलने में परेशानी, समन्वय और संतुलन की कमी इस रोग के मुख्य लक्षण हैं. सेंटर नर्व्स सिस्टम के डैमेज होने पर पार्किंसन की बीमारी की आहट सुनाई देने लगती है.

चलने और हाथ पैर को अपनी मर्जी से न हिला पाना इसके शुरूआती लक्षण हैं, जो धीरे धीरे मरीज को हताशा और अधीरता जैसी मानसिक परेशानियों की तरफ भी ले जाते हैं. इन लोगों को पार्किंसन बीमारी का खतरा रहता है अधिक-वेंकटेश्वर अस्पताल में न्यूरोलॉजी कंसलटेंट डा. दिनेश सरीन बताते हैं कि अनुवांशिकता या परिवार के एक या दो सदस्यों के इस बीमारी से पीड़ित होने पर बाकी सदस्यों के भी इसकी चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है. महिलाओं के मुकाबले पुरूषों के इस बीमारी से प्रभावित होने की आशंका ज्यादा रहती है.

ये रिसर्च के दावे पर हैं. https://www.reporter17.com इसकी पुष्टि नहीं करता. आप किसी भी सुझाव पर अमल या इलाज शुरू करने से पहले अपने एक्सपर्ट की सलाह जरूर ले लें.

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